‘वॉइस में ऑफ डीसी’ में फिर उठी डेली कॉलेज बोर्ड और प्रिंसिपल को लेकर आवाज, लिखा-2020 में हुई ‘पार्ट-टाइम प्रिंसिपल मॉडल’ की शुरुआत.
इंदौर। डेली कॉलेज का संविधान बदलने की कवायद में जुटे डीसी बोर्ड के खिलाफ सोशल मीडिया पर वॉइस ऑफ डीसी के माध्यम से लगातार आवाज उठ रही है। पैरेंट्स और ओल्ड डेलियन डीसी बोर्ड की कार्यप्रणाली से लेकर संविधान बदलने को लेकर भी सवाल पूछ रहे हैं। एक ताजा पोस्ट में डेली कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ.गुनमीत बिन्द्रा को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
उल्लेखनीय है कि डॉ.बिंद्रा दिल्ली पब्लिक स्कूल, राजपुरा की ट्र्स्टी हैं। जब से वे डेली कॉलेज आई हैं, तब से डीपीएस राजपुरा में डेली कॉलेज के कई प्रोग्राम लागू किए जा रहे हैं। यहां तक कि गेस्ट भी दोनों जगह एक ही आने लगे। डॉ.बिंद्रा डीपीएस राजपुरा की प्रो-वाइस चेयरपर्सन भी हैं। पैरेंट्स का कहना है कि उनका ज्यादा ध्यान डीपीएस राजपुरा पर रहता है, इसलिए डेली कॉलेज में पढ़ाई का कबाड़ा हो रहा है। वॉइस ऑफ डीसी में पैरेंट्स ने डॉ.बिन्द्रा का एक इंटरव्यू भी शेयर किया है, जिसमें वह कहती नजर आ रही हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता राजपुरा है।
इंटरव्यू में कह रही हैं बिन्द्रा-2020 से पांच साल नहीं बढ़ाई फीस
वॉइस ऑफ डीसी में डॉ.बिन्द्रा का एक इंटरव्यू भी लगाया गया है। डीडी भारत के इस इंटरव्यू में डीपीएस राजपुरा के फी स्ट्रक्चर को लेकर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए वे कहती हैं-मैंने 2020 में स्कूल शुरू किया था। तब से लेकर पांच साल (यानी 2025) हो गए, फीस नहीं बढ़ाई। इसका मतलब साफ है कि डॉ.बिन्द्रा का यह इंटरव्यू ताजा है।
वॉइस ऑफ डीसी में उठे सवाल
बोर्ड अध्यक्ष श्री विक्रम ने जिस तरह एक पेड इंटरव्यू में प्राचार्या के राजपुरा स्थित उनके दूसरे स्कूल के लिए होने वाले नियमित दौरों का बचाव किया-जबकि डीसी खुद उपेक्षित रहता है-वह लगभग… परफ़ेक्ट ही लगता है।
आख़िर कोई तो है जिसे इस “गोल्डन डील” की रक्षा करनी है।
और अब सब समझ चुके हैं:
यह चुनावों का मामला नहीं है…यह हमारे स्कूल के अस्तित्व का सवाल है।
इस बीच, डीसी भारत का पहला ऐसा स्कूल बन गया है जिसके पास एक पार्ट-टाइम प्रिंसिपल है।
एक “ऐतिहासिक उपलब्धि”…बस वैसी नहीं, जैसी कोई चाहता था।
माता-पिता और पूर्व छात्र इस कहानी की शुरुआत 2015 से बताते हैं-जब वे दो किरदार, जिन्हें वे मज़ाक में “मिस्टर गड़बड़गरा” और “मिस्टर बुल्ला” कहते हैं, ने डीसी की “गोल्डमाइन क्षमता” खोज ली थी:
-आसान चंदे
-बढ़ती हुई फ़ीस
-और एक ऐसा बोर्ड ढांचा जिसे “मैनेज” करना आसान था
और किसी तरह…वे सफल भी हो गए।
लेकिन फिर बाधा आई:
ईमानदार प्रिंसिपल।
जो भी उनके हिसाब से नहीं चला, वह ज़्यादा समय टिक नहीं पाया-कम्युनिटी का ऐसा कहना है।
फिर आया 2022 का “गोल्डन हैंडशेक”-और उसी के साथ पार्ट-टाइम प्रिंसिपल मॉडल की शुरुआत।
अब व्यवस्था कुछ ऐसी दिखती है:
-प्रिंसिपल अपने स्वयं के स्कूल (डीपीएस राजपुरा) को संभालती हैं
-बोर्ड डीसी के लिए अपने हिसाब से योजनाएँ चलाता है
-कोई आपत्ति नहीं। कोई सवाल नहीं। कोई जवाबदेही नहीं।
और परिणाम जो कम्युनिटी देख रही है?
-खर्चे आसमान छू रहे हैं
-हॉस्टल आधी क्षमता पर चल रहे हैं
- बच्चे ट्यूशनों पर निर्भर होते जा रहे हैं
-खेल अब निजी कोचों के भरोसे है
जो कुछ कभी डीसी की ताकत था...अब वह टूटता हुआ महसूस हो रहा है।