भागीरथपुरा के दूषित पानी पर हाईकोर्ट ने कहा-इंदौर शहर की छवि को पहुंचा गंभीर नुकसान, अफसरों पर तय हो सकती है क्रिमिनल जिम्मेदारी.
इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में मंगलवार को हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में सुनावई हुई। इस दौरान कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस घटना ने इंदौर शहर की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ इंदौर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में स्वच्छ पानी जनता का मौलिक अधिकार है और इससे किसी भी हाल में समझौता नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने पहली बार इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि यदि भविष्य में आवश्यकता पड़ी तो दोषी अधिकारियों पर सिविल और क्रिमिनल लायबिलिटी भी तय की जाएगी। साथ ही संकेत दिए गए कि अगर पीड़ितों को मुआवजा कम मिला है तो उस पर भी अदालत उचित निर्देश जारी करेगी। कोर्ट ने दूषित पानी से प्रभावित मरीजों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा इस पूरे मामले में हुई मौतों को लेकर विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की गई है। अगली सुनवाई 15 जनवरी को होगी, जिसमें मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं।
कोर्ट को बताया गया कि दूषित पानी पीने से अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है। फिलहाल 110 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं, जबकि कुल 421 मरीजों को अब तक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इनमें से 311 मरीज डिस्चार्ज हो चुके हैं। आईसीयू में 15 मरीजों का इलाज जारी है। वहीं उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए हैं, जिनमें से 6 मरीजों को अरबिंदो अस्पताल रेफर किया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 31 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को स्वच्छ पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे, लेकिन प्रभावित इलाकों में अब भी दूषित पानी की सप्लाई की जा रही है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि प्रशासन ने पहले की गई शिकायतों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया, यदि ऐसा किया जाता तो यह स्थिति पैदा ही नहीं होती। कोर्ट को यह भी बताया गया कि वर्ष 2022 में महापौर द्वारा नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन फंड जारी न होने के कारण अब तक काम शुरू नहीं हो सका। 2017-18 में इंदौर के विभिन्न क्षेत्रों से लिए गए 60 पानी के सैंपलों में से 59 पीने योग्य नहीं पाए गए थे। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इस रिपोर्ट के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को निर्देश दिए हैं कि वे इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करें और एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार भी शामिल है और इसकी अनदेखी गंभीर विषय है।