राहुलजी, आपके कहने के बाद भी कांग्रेस से क्यों नहीं हटे लंगड़े घोड़े, जिला अध्यक्षों की सूची से तो नहीं लगता कि किसी ने आपकी सुनी.
भोपाल। इसी साल जून माह में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भोपाल आए थे। तब उन्होंने संगठन सृजन अभियान की शुरुआत की थी और कांग्रेस के जमीनी कार्यकार्ताओं को बहुत उम्मीद दिलाई थी। राहुल गांधी ने कहा था कि बारात के घोड़े और लंगड़े घोड़े को पार्टी से अलग कर सिर्फ रेस के घोड़ों को शामिल करना होगा। शनिवार को प्रदेश के जिलाध्यक्षों की जो सूची सामने आई है, उससे ऐसा लगता है कि राहुल गांधी की किसी ने सुनी नहीं।
राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि मध्यप्रदेश में विचारधारा के कार्यकर्ताओं और नेताओं की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा था कि हम जिस कमरे में बैठे हैं उसी कमरे में ऐसे कई कार्यकर्ता हैं जो भाजपा को हराने का टैलेंट रखते हैं, लेकिन मुझे पता है कि आपके हाथ बंधे हुए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आपकी आवाज संगठन में ठीक से सुनाई नहीं देती है। इसके साथ ही उन्होंने जिलाध्यक्षों के चुनाव के लिए केंद्र से आब्जर्वर भी भेजे, सारे नियम-कायदे समझा दिए, लेकिन हुआ वही जो हमेशा से होता आया है।
विधायकों को भी बना दिया जिला अध्यक्ष
राहुलजी, आपने तो आम कार्यकर्ताओं की उम्मीद बढ़ाई थी। प्रक्रिया भी इतनी सख्त बताई गई थी कि लगा कि इस बार तो कम से कम जमीनी कार्यकर्ताओं को मौका मिलेगा, लेकिन आपकी प्रदेश कांग्रेस ने तो विधायकों और पूर्व विधायकों को भी जिला अध्यक्ष बना दिया। सबसे खास बात यह कि इसमें दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह भी शामिल हैं। इस नियुक्ति का तो आपके राघौगढ़ में ही विरोध शुरू हो गया है और कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष का पुतला जला दिया है। ताज्जुब तो तब होता है कि आपकी सूची में एक ऐसे विधायक ओमकार सिंह मरकाम डिंडौरी को जिलाध्यक्ष बनाया गया है, जिसे कांग्रेस ने कभी आदिवासी सीएम के तौर पर आगे बढ़ाया था।
बाहरियों को भी सौंप दी है कमान
कई ऐसे नेताओं को कमान दी है, जो उस जिले के मूल निवासी नहीं हैं या फिर लंबे समय से उस क्षेत्र में सक्रिय नहीं हैं। प्रतिभा रघुवंशी मूल रूप से गुना की रहने वाली हैं और युवा कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। उन्हें खंडवा शहर का अध्यक्ष बनाया गया है। इसी तरह मनीष चौधरी भी लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में काम कर रहे हैं। देवास ग्रामीण में लंबे समय से सक्रिय नहीं हैं। उमरिया के जिलाध्यक्ष बने विजय कोल की पत्नी भोपाल में जॉब करती हैं। वे ज्यादातर समय भोपाल में ही रहते हैं। इसी तरह कई अन्य जिलों में भी हुआ है।
कई स्थानों पर हो रहा है विरोध
सतना, गुना, बुरहानपुर, राघौगढ़ सहित कई कई जिलों में नई नियुक्तियों का विरोध हो रहा है। बुरहानपुर में जिलाध्यक्ष की दावेदारी करने वाले हेमंत पाटिल ने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। देवास में तो कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के करीबी गौतम बंटू गुर्जर ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इंदौर शहर अध्यक्ष चिंटू चौकसे और जिला अध्यक्ष विपिन वानखेड़े का विरोध शुरू हो गया है। कांग्रेस की पूर्व महिला मोर्चा अध्यक्ष साक्षी शुक्ला डागा ने विरोध दर्ज कराते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। वहीं संभागीय प्रवक्ता सन्नी राजपाल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उज्जैन में कांग्रेस नेता हेमंत सिंह चौहान ने जिलाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर नाराजगी जाहिर की।
मुस्लिम नेताओं में भी नाराजगी
71 जिलाध्यक्षों में मात्र दो मुस्लिम कांग्रेस के 71 जिलाध्यक्षों में से मात्र दो मुस्लिम नेताओं को ही जिलों की कमान सौंपी गई है। सतना शहर में इकबाल अहमद सिद्दीकी और पन्ना में अनीस खान को अध्यक्ष बनाया गया है। जबकि, भोपाल, बुरहानपुर, खंडवा सहित करीब 7 जिलों में जिलाध्यक्षों के लिए मुस्लिम नेताओं ने दावेदारी पेश की थी। इसको लेकर कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं में भी नाराजगी है।
कमलनाथ पर भारी दिख रहे दिग्विजय सिंह
सूची में दिग्विजय सिंह कमलनाथ पर भारी दिख रहे हैं। इस सूची में दिग्विजय सिंह के बेटे के साथ भतीजे को भी जगह दी गई है, जबकि उनके कई समर्थक भी इसमें शामिल हैं। इसके विपरित कमलनाथ के करीबियों की संख्या काफी कम है। इसका मतलब साफ है कि इस नियुक्ति में दिग्विजय सिंह का प्रभाव ज्यादा रहा है।
बिना आवेदन ही बना दिए अध्यक्ष
कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि कई ऐसे जिलाध्यक्ष भी बनाए गए हैं, जिन्होंने आवेदन ही नहीं दिया। ऐसे जिलाध्यक्षों की संख्या 15 बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि इन्हें पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट और राहुल गांधी की सहमति के बाद नियुक्त किया गया है। इसको लेकर भी कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं।
फेल दिख रही है राहुल गांधी की कवायद
गुजरात में जब राहुल गांधी गए थे तो वहां संगठन की हालत देख कई कड़े फैसले लिए थे। इसी तर्ज पर वे मध्यप्रदेश में लंबे समय से सत्ता से दूर रही कांग्रेस में बदलाव चाहते थे। इसीलिए उन्होंने आब्जर्वर भी भेजे और जिलाध्यक्षों की नियुक्ति के लिए नियम-कायदे भी तय किए। वर्तमान सूची को देखकर ऐसा नहीं लगता कि राहुल गांधी की बात को पूरी तरह से तवज्जो दी गई है। आधी कांग्रेस तो भाजपा में आ चुकी है, जो लोग आज भी निष्ठा के साथ कांग्रेस की सेवा कर रहे हैं अगर उन्हें नहीं संभाला गया तो प्रदेश में कांग्रेस को अपने पैरों पर फिर से खड़ा कर पाना मुश्किल होगा।