जहरीली हवा, मिटती यादें: नई स्टडी का अलार्म—PM2.5 बढ़ा तो अल्जाइमर और डिमेंशिया का खतरा कई गुना.
जहरीली हवा, मिटती यादें: नई स्टडी का अलार्म—PM2.5 बढ़ा तो अल्जाइमर और डिमेंशिया का खतरा कई गुना
जिस हवा को हम जीवन का आधार मानकर भीतर खींचते हैं, वही अब हमारी याददाश्त पर सीधा हमला कर रही है। एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने साफ कर दिया है कि वायु प्रदूषण अब सिर्फ फेफड़ों या दिल की बीमारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह दिमाग को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। शोध के मुताबिक, हवा में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर PM2.5 की बढ़ोतरी से डिमेंशिया का खतरा करीब 40% और अल्जाइमर का जोखिम 47% तक बढ़ सकता है। भारत जैसे प्रदूषणग्रस्त देशों के लिए यह चेतावनी किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है।
अमेरिका में किए गए इस व्यापक अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल PLOS Medicine में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं ने 2000 से 2018 के बीच 65 वर्ष से अधिक उम्र के 2.78 करोड़ अमेरिकी नागरिकों के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया। नतीजे चौंकाने वाले हैं—जो लोग लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहे, उनमें अल्जाइमर और अन्य प्रकार के डिमेंशिया का खतरा कहीं अधिक पाया गया।
सबसे अहम बात यह रही कि यह जोखिम हाई ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक या डिप्रेशन जैसी बीमारियों को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहा। यानी जहरीली हवा दिमाग पर सीधे प्रहार कर सकती है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन लोगों को पहले स्ट्रोक हो चुका था, उनमें प्रदूषण का असर और ज्यादा गंभीर था—कमजोर मस्तिष्क के लिए दूषित हवा कहीं अधिक घातक साबित होती है।
जिन इलाकों में यह अध्ययन किया गया, वहां PM2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा तय सुरक्षित सीमा से लगभग दोगुना था। WHO के अनुसार, सालाना औसत PM2.5 स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि भारत, चीन और अफ्रीका के कई हिस्सों में यह सीमा कई गुना पार हो चुकी है।
भारत के कई शहरों में बढ़ता प्रदूषण और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी—यह खतरनाक संयोजन भविष्य में डिमेंशिया और अल्जाइमर के मामलों में विस्फोटक वृद्धि का संकेत देता है। यह केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि परिवारों की स्मृतियों, सामाजिक ढांचे और आने वाली पीढ़ियों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर संकट है।
वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि यदि ट्रैफिक, उद्योगों और पराली जलाने से निकलने वाले प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए और हवा की गुणवत्ता सुधारी जाए, तो अल्जाइमर और डिमेंशिया के मामलों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
साफ हवा का मतलब सिर्फ बेहतर सांस नहीं, बल्कि सुरक्षित यादें भी हैं। अब सवाल यह नहीं कि प्रदूषण कितना खतरनाक है—असल चुनौती यह है कि हम इसे रोकने के लिए कितनी जल्दी और कितनी सख्ती से कदम उठाते हैं।