कर्मचारी गृह निर्माण संस्था की वरीयता सूची पर विवाद, कोर्ट की आड़ में भूमाफिया दीपक मद्दा से मिलकर सहकारिता विभाग ने जमाया खेल.
इंदौर। वर्षों से विवादित कर्मचारी कर्मचारी गृह निर्माण संस्था की वरीयता सूची इन दिनों चर्चा में है। सहकारिता विभाग ने कोर्ट की आड़ में वरीयता सूची फाइनल कर दी है और अब गेंद इंदौर विकास प्राधिकरण के पाले में डाल दी गई है। सहकारिता विभाग ने सूची फाइनल कर कोर्ट को तो दे दी, लेकिन यह नहीं बताया कि इसको लेकर कितने केस पेंडिंग है। ईओडब्ल्यू की जांच तक को छुपा लिया गया है।
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे मामले में भूमाफिया दीपक मद्दा और सहकारिता विभाग के पूर्व उप अंकेक्षक आनंद पाठक का खेल है। वरीयता सूची का मामला लंबे समय से विवादों में है। इस पर ईओडब्लू से लेकर सहकारिता विभाग में ही कई केस चल रहे हैं। मामले की जांच-पड़ताल चल रही है। इस बीच सहकारिता विभाग ने बड़ी ही चालाकी से हाईकोर्ट में चल रहे एक मामले की आड़ में वरीयता सूची सौंप दी। हाईकोर्ट ने इंदौर विकास प्राधिकरण को आदेश दिए कि इस सूची के आधार पर प्लॉट का आवंटन 24 नवंबर तक कर दे।
पहले आईडीए कर चुका है अनुबंध निरस्त
आईडीए के सूत्रों के अनुसार कर्मचारी गृह निर्माण संस्था से 1990 में अनुबंध हुआ था। इसके अनुसार संस्था को आईडीए में राशि जमा करानी थी, लेकिन पैसे जमा नहीं हुए। इसके बाद आईडीए ने अनुबंध निरस्त कर दिया। मामला हाईकोर्ट में चला गया। हाईकोर्ट ने अनुबंध बहाल करने को कहा। इसके बाद आईडीए सुप्रीम कोर्ट चला गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुबंध बहाल करें, क्योंकि जमीन की मालिक संस्था है। इसके बाद हाईकोर्ट में फिर मामला पहुंचा कि आईडीए आदेश का पालन नहीं कर रहा। इसी बीच सहकारिता विभाग ने हाईकोर्ट में सूची पहुंचा दी। अब हाईकोर्ट ने आईडीए से कहा है कि सहकारिता विभाग की सूची के आधार पर प्लॉट का आवंटन 24 नवंबर से पहले कर दें।
संस्था के सदस्य चौरसिया ने भी लगाई आपत्ति
संस्था के एक सदस्य बालेश चौरसिया ने उपायुक्त सहकारी संस्थाएं इंदौर, संयुक्त आयुक्त इन्दौर और इंदौर विकास प्राधिकरण के सीईओ को पत्र लिखकर एक आपत्ति लगाई है। इसमें हाईकोर्ट के एक आदेश तथा अन्य प्रकरणों का हवाला देते हुए कहा गया है कि संस्था द्वारा प्रेषित वरीयता सूची के आधार पर प्लॉटों का आवंटन नहीं करें। चौरसिया ने इस सूची को अवैधानिक बताया है।
दीपक मद्दा से मिलीभगत कर दे दी सूची
सहकारिता विभाग ने चौरसिया के दस्तावेज सहित प्रस्तुत आपत्ति का भी ध्यान नहीं रखा। सूत्र बताते हैं कि डीआर ने भूमाफिया दीपक मद्दा से मिलकर सूची कोर्ट में दे दी। इस पूरे प्रकरण में सहकारिता विभाग के पूर्व अंकेक्षक आनंद पाठक की भूमिका संदिग्ध है। यह वही पाठक हैं जिन्होंने विवादों में आने के बाद नौकरी छोड़ दी थी। इन दिनों दीपक मद्दा जैसे कई भूममाफियाओं के साथ जमीनों के सौदे निपटा रहे हैं।
ईओडब्ल्यू के प्रकरण की भी की अनदेखी
इस मामले में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ इकाई (ईओडब्ल्यू) में प्रकरण पंजीबद्ध है। ईओडब्ल्यू ने 23 सितंबर 25 को ही सुरेंद्र जैन सहकारी निरीक्षक इंदौर, एनके राठौर सेवानृवित्त वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक इंदौर, बीएल मकवाना, संयुक्त आयुक्त सहकारिता, इंदौर, राधेश्याम गरोठिया सहकारी निरीक्षक इंदौर सहित संस्था के सदस्यों को नोटिस जारी किया था। इन सभी को 25 सितंबर 25 को भोपाल में बयान के लिए बुलाया था। वरीयता सूची फाइनल करते समय इस केस का भी ध्यान नहीं रखा गया।
हर सदस्य से 20-20 लाख लेने की चर्चा
सूत्र बताते हैं कि वरीयता सूची के लिए प्रति सदस्य 20-20 लाख रुपए की वसूली भी की गई है। यह सहकारिता से लेकर संबंधित विभागों के अधिकारियों के नाम पर वसूली गई है। यह वसूली भूमाफिया दीपक, उसके गुर्गों और सहकारिता विभाग के कुछ अधिकारियों द्वारा की गई है।
डीआर को सूची जारी करने का अधिकार नहीं
सूत्र बताते हैं कि सहकारिता विभाग के एक आदेश के अनुसार डीआर को वरीयता सूची जारी करने का अधिकार ही नहीं है। इस संबंध में जेआर ने डीआर को एक सर्कुलर भी जारी किया था, लेकिन डीआर ने उसकी भी अनदेखी कर दी और बाले-बाले सारे खेल कर दिए और कोर्ट का डर दिखाकर आईडीए को फंसा दिया। सूत्र बताते हैं कि जब आरपी अहिरवार आईडीए सीईओ थे, तब उनके पास यह मामला पहुंचा था, लेकिन चूंकि उन्हें पूरे प्रकरण की जानकारी थी इसलिए उन्होंने इससे खुद को अलग ही रखा। अब नए सीईओ बदलते ही सहकारिता विभाग को मौका मिल गया।