स्वदेशी तकनीक का कमाल: तारापुर की पहली परमाणु यूनिट फिर हुई जवान, भारत ने रचा एशिया में इतिहास
भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। पालघर स्थित तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र (TAPS) की यूनिट-1 का पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से सफल जीर्णोद्धार कर उसे दोबारा 160 मेगावाट क्षमता के साथ राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ दिया गया है।
इसके साथ ही भारत एशिया का पहला देश बन गया है जिसने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक के बल पर किसी परमाणु ऊर्जा संयंत्र का जीवनकाल बढ़ाया है। 160 मेगावाट क्षमता वाली टीएपीएस-2 का नवीनीकरण भी अंतिम चरण में है और इसे जल्द ही ग्रिड से जोड़ा जाएगा।
57 साल बाद भी नई ऊर्जा
1969 में शुरू हुए टीएपीएस-1 और टीएपीएस-2 सोवियत संघ के बाहर एशिया के पहले परमाणु रिएक्टर थे। सामान्यतः परमाणु रिएक्टर की आयु 40–50 वर्ष मानी जाती है और इसके बाद अधिकांश देश उन्हें डी-कमीशन कर देते हैं।
लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता और गुणवत्ता के बल पर इन रिएक्टर ने 57 वर्षों की सेवा के बाद पुनः नई ऊर्जा के साथ अगले 15–20 वर्षों तक संचालन के लिए खुद को तैयार कर लिया है।
छह साल चला आधुनिकीकरण अभियान
न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के अनुसार, 2020 में इन दोनों इकाइयों को व्यापक नवीनीकरण, आधुनिकीकरण और वृद्धावस्था प्रबंधन कार्यों के लिए बंद किया गया था। छह वर्षों तक कड़े नियामक निरीक्षण के तहत इनका जीर्णोद्धार किया गया।
मुख्य कार्यों में शामिल थे:
- रिएक्टर पुनर्संचरण पाइपिंग को उन्नत संक्षारण-रोधी सामग्री से बदलना
- 3D लेजर स्कैनिंग तकनीक का उपयोग
- टरबाइन-जनरेटर प्रणाली का आधुनिकीकरण
- विद्युत प्रणालियों में व्यापक सुधार
इन जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं का सफल समापन एनपीसीआईएल की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता और स्वदेशी क्षमता का प्रमाण है।
पर्यावरण के लिए बड़ी राहत
अपने लंबे कार्यकाल में टीएपीएस-1 और 2 ने 1,00,000 मिलियन यूनिट से अधिक स्वच्छ बिजली का उत्पादन किया है। इससे लगभग 86 मिलियन टन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जा सका — जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि है।
भारत के परमाणु कार्यक्रम की मजबूत नींव
टीएपीएस-1 और 2 पहली पीढ़ी के बीडब्ल्यूआर (Boiling Water Reactor) हैं, जिनमें लो-एनरिच्ड यूरेनियम का उपयोग कूलेंट और मॉडरेटर के रूप में किया जाता है।
दोनों इकाइयों को 1968 में पूर्णता मिली और 1969 में ग्रिड से जोड़ा गया। टीएपीएस-1 ने 28 अक्टूबर 1969 को व्यावसायिक संचालन शुरू किया।
भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा की परिकल्पना के अनुरूप 210 मेगावाट प्रति यूनिट की मूल क्षमता के साथ तारापुर संयंत्र ने भारत को परमाणु ऊर्जा अपनाने वाले शुरुआती देशों में स्थापित किया। बाद में तकनीकी कारणों से क्षमता घटाकर 160 मेगावाट कर दी गई थी।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ी छलांग
तारापुर की इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि भारत न केवल परमाणु ऊर्जा उत्पादन में आत्मनिर्भर है, बल्कि जटिल रिएक्टर तकनीक के जीवनकाल विस्तार जैसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में भी वैश्विक स्तर पर अग्रणी बन चुका है।
यह उपलब्धि “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में एक और मजबूत कदम मानी जा रही है।
स्वदेशी तकनीक का कमाल: तारापुर की पहली परमाणु यूनिट फिर हुई जवान, भारत ने रचा एशिया में इतिहास
भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। पालघर स्थित तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र (TAPS) की यूनिट-1 का पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से सफल जीर्णोद्धार कर उसे दोबारा 160 मेगावाट क्षमता के साथ राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ दिया गया है।
इसके साथ ही भारत एशिया का पहला देश बन गया है जिसने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक के बल पर किसी परमाणु ऊर्जा संयंत्र का जीवनकाल बढ़ाया है। 160 मेगावाट क्षमता वाली टीएपीएस-2 का नवीनीकरण भी अंतिम चरण में है और इसे जल्द ही ग्रिड से जोड़ा जाएगा।
57 साल बाद भी नई ऊर्जा
1969 में शुरू हुए टीएपीएस-1 और टीएपीएस-2 सोवियत संघ के बाहर एशिया के पहले परमाणु रिएक्टर थे। सामान्यतः परमाणु रिएक्टर की आयु 40–50 वर्ष मानी जाती है और इसके बाद अधिकांश देश उन्हें डी-कमीशन कर देते हैं।
लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता और गुणवत्ता के बल पर इन रिएक्टर ने 57 वर्षों की सेवा के बाद पुनः नई ऊर्जा के साथ अगले 15–20 वर्षों तक संचालन के लिए खुद को तैयार कर लिया है।
छह साल चला आधुनिकीकरण अभियान
न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के अनुसार, 2020 में इन दोनों इकाइयों को व्यापक नवीनीकरण, आधुनिकीकरण और वृद्धावस्था प्रबंधन कार्यों के लिए बंद किया गया था। छह वर्षों तक कड़े नियामक निरीक्षण के तहत इनका जीर्णोद्धार किया गया।
मुख्य कार्यों में शामिल थे:
रिएक्टर पुनर्संचरण पाइपिंग को उन्नत संक्षारण-रोधी सामग्री से बदलना
3D लेजर स्कैनिंग तकनीक का उपयोग
टरबाइन-जनरेटर प्रणाली का आधुनिकीकरण
विद्युत प्रणालियों में व्यापक सुधार
इन जटिल तकनीकी प्रक्रियाओं का सफल समापन एनपीसीआईएल की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता और स्वदेशी क्षमता का प्रमाण है।
पर्यावरण के लिए बड़ी राहत
अपने लंबे कार्यकाल में टीएपीएस-1 और 2 ने 1,00,000 मिलियन यूनिट से अधिक स्वच्छ बिजली का उत्पादन किया है। इससे लगभग 86 मिलियन टन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जा सका — जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि है।
भारत के परमाणु कार्यक्रम की मजबूत नींव
टीएपीएस-1 और 2 पहली पीढ़ी के बीडब्ल्यूआर (Boiling Water Reactor) हैं, जिनमें लो-एनरिच्ड यूरेनियम का उपयोग कूलेंट और मॉडरेटर के रूप में किया जाता है।
दोनों इकाइयों को 1968 में पूर्णता मिली और 1969 में ग्रिड से जोड़ा गया। टीएपीएस-1 ने 28 अक्टूबर 1969 को व्यावसायिक संचालन शुरू किया।
भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा की परिकल्पना के अनुरूप 210 मेगावाट प्रति यूनिट की मूल क्षमता के साथ तारापुर संयंत्र ने भारत को परमाणु ऊर्जा अपनाने वाले शुरुआती देशों में स्थापित किया। बाद में तकनीकी कारणों से क्षमता घटाकर 160 मेगावाट कर दी गई थी।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ी छलांग
तारापुर की इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि भारत न केवल परमाणु ऊर्जा उत्पादन में आत्मनिर्भर है, बल्कि जटिल रिएक्टर तकनीक के जीवनकाल विस्तार जैसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में भी वैश्विक स्तर पर अग्रणी बन चुका है।
यह उपलब्धि “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में एक और मजबूत कदम मानी जा रही है।