आखिर हो क्या गया अपने इंदौर को…कोई तो नजर उतार दो भाई.
पिछले कुछ समय से इंदौर में जो भी घटनाक्रम हो रहे हैं, उसकी कल्पना शहरवासियों ने नहीं की थी। लगातार कुछ न कुछ एसी घटनाएं हो रही हैं, जिससे इंदौर की बदनामी हो रही है। देश के अन्य शहर के लोग जब इंदौर का नाम सबसे स्वच्छ शहर के रूप में सुनते थे, तो उन्हें जलन होती थी। अब माहौल बदल गया है।
पिछले साल इंदौर तब चर्चा में आया जब प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के एनआईसीयू में चूहे के कुतरने से बच्चों की मौत हो गई थी। इसके बाद जाते हुए वर्ष ने इंदौर को ऐसा दर्द दिया, जिसे कई सालों तक भूल पाना मुश्किल है। सफाई में नंबर वन शहर की नंबर वन यानी एक नंबर विधानसभा के भागीरथपुरा में जो कुछ भी हुआ, उसने शहर पर बदनुमा दाग लगा दिया।
ताज्जुब की बात यह कि भागीरथपुरा कांड के बाद जनप्रतिनिधियों के जो बयान आए, उसने तो गंदे पानी से हो रही मौतों का दर्द और बढ़ा दिया। लोग अभी भी सकते में हैं कि कैलाश विजयवर्गीय जैसे अनुभवी नेता आखिर अपनी ही विधानसभा में कैसे चूक गए? इससे भी बड़ी बात कि हमेशा उनकी बात सुनने वाली जनता ने इस बार उन्हें दुत्कार दिया।
इस शहर ने पहली बार गड्ढों का दर्द भी झेला। बारिश के बाद हर साल शहर की डामर की सड़कें खराब होती थीं, लेकिन अनंत चतुर्दशी तक तो सबकुछ चकाचक हो जाता था। अब जबकि सीमेंट की सड़कें बन गईं हैं, इसके बाद भी लोगों ने गड्ढों में ही दीपावली मनाई। विडंबना यह कि इसके लिए जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को ये गड्ढे नजर ही नहीं आए।
सच कहें तो इस शहर ने पहली बार राजनीति का इतना पतन देखा और नेताओं की ढिठाई भी। मंत्री विजयवर्गीय के खास समर्थक सुमित मिश्रा नगर अध्यक्ष की गद्दी पर बैठ तो गए, लेकिन भाजपा कार्यालय पर उनके पोस्टर और नेम प्लेट पर कालिख पुत गई। पानी गंदा है, फिर भी नेता मान नहीं रहे। भागीरथपुरा की घटना के बाद नेताओं को भारत-न्यूजीलैंड मैच से दूरी बनाने की बात कहने वाले प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह खुद ही अपने बेटे के साथ स्टेडियम में नजर आए।
अधिकारी कह रहे नेता काम नहीं करने दे रहे, नेता कह रहे अधिकारी सुनते नहीं। सबकुछ उल्टा-पुल्टा ही हो रहा है।
क्या आपको नहीं लगता कि अपने शहर को किसी की नजर लग गई है…कोई उपाय हो तो बता दीजिए…