आखिर इतने घोटाले के बाद भी सुरेश भदौरिया पर किसकी मेहरबानी, हर बार बच निकलता है यह ‘फर्जी डॉक्टरों की फैक्ट्री’ का मालिक.
इंदौर। मेडिकल एजुकेशन की फील्ड में लगातार घोटाले करने वाला इंडेक्स समूह का मालिक सुरेश सिंह भदौरिया आखिर हर बार कैसे बच निकलता है। व्यापमं से लेकर अब तक अनगिनत केस उस पर हुए, लेकिन उसका फर्जीवाड़ा और बढ़ता गया। बड़ा सवाल यह है कि फर्जी डॉक्टरों की फैक्ट्री के इस मालिक को किसका संरक्षण है। कौन है जो इसे आम जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की छूट दे रहा है।
उल्लेखनीय है कि इंडेक्स मेडिकल कॉलेज में लगातार गड़बड़ियां होती रही हैं। कभी कोई दल निरीक्षण के लिए जाता है तो फर्जी मरीज, फर्जी डॉक्टर से लेकर सारे इंतजाम फर्जी करने की खबरें आती रही हैं। यह फर्जीवाड़ा आगे भी जारी रहा, जिसके कारण और बड़े घोटाले होते गए। अब हालत यह है कि भदौरिया फर्जीवाड़े का शहंशाह हो गया है और पूरे देश में फर्जी मेडिकल कॉलेजों को मान्यता दिलाने की सुपारी भी लेता है।
सीबीआई पहुंची तो हो गया फरार
सीबीआई ने भदौरिया सहित 35 लोगों के खिलाफ रावतपुरा सरकार इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज के घोटाले के मामले में धोखाधड़ी का केस दर्ज किया है। भदौरिया सहित 35 आरोपी एक रैकेट संचालित करते हैं, जो देशभर में मेडिकल कॉलेजों की मान्यता दिलाने, उन्हें रिन्यू कराने के मामले में शामिल है। सीबीआई ने सबसे पहले छत्तीसगढ़ के रावतपुरा सरकार इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज पर छापा मारा था, वहां घोटाले से जुड़े दस्तावेज हाथ लगे और फिर देशभर में सीबीआई ने छापा मारा था। इसमे इंदौर का इंडेक्स कॉलेज भी शामिल है। इस कॉलेज में व भदौरिया के घर पर भी सीबीआई ने छापा मारा। छापे के बाद से ही भदौरिया फरार हो गया है।
निजी विश्वविद्यालय की अनुमति भी ले चुका
ताज्जुब तो तब होता है कि जब इतने घोटाले के बाद भी भदौरिया के कॉलेजों को लगातार मान्यता मिलती रहती है। भदौरिया के इंदौर और देवास में मेडिकल कॉलेज, अस्पताल और नर्सिंग कॉलेज तो हैं हीं, अब वह निजी विश्वविद्यालय की अनुमति भी ले चुका है। भदौरिया के खिलाफ दस साल पहले भी सीबीआई केस दर्ज कर चुकी है और उसकी गिरफ्तारी भी हो चुकी थी। इसके अलावा भदौरिया व्यापमं घोटाले का भी आरोपी रह चुका है। आरोप है कि उसने अपने कॉलेज में भी कुछ स्टूडेंटों को फर्जी डिग्री दी होगी। इस मामले में भी जांच एजेसियां पड़ताल करने की तैयारी कर रही है।
डीएवीवीवी के पूर्व कुलपति का भी है साथ
सीबीआई ने रावतपुरा सरकार के भ्रष्टाचार के मामले में इंडेक्स मेडिकल कॉलेज के चेयरमैन सुरेश भदौरिया और यूजीसी के पूर्व चेयरमैन और डीएवीवी के पूर्व कुलपति डीपी सिंह को आरोपी बनाया है। सीबीआई ने माना है कि भदौरिया फर्जी तरीके से कॉलेजों को मान्यता दिलाने और रिन्यू कराने में सक्रिय भूमिका निभा रहा थेा इसके बदले मोटी दलाली भी वसूल रहे थे। सीबीआई ने एफआईआर में इसका जिक्र किया है। डीपी सिंह वर्तमान में वे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के चांसलर हैं। अप्रैल 2024 में यहां चांसलर बनने से पहले वह यूजीसी के चेयरमैन थे। इस पद के पहले वह इंदौर के देवी अहिल्या विवि के कुलपति पद पर रहे थे। वे बीएचयू के भी कुलपति रह चुके हैं। उन पर आरोपी है कि रावतपुरा सरकार मेडिकल कॉलेज को एनएमसी की पॉजिटिव रिपोर्ट दिलवाने में उन्होंने भूमिका निभाई।
स्वास्थ्य मंत्रालय में भदौरिया की गहरी पकड़
प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में गहरी पैठ बनाकर भदौरिया कॉलेजों को फर्जी तरीके से मान्यता दिलाने और रिन्यूअल में सक्रिय भूमिका निभा रहा था। एफआईआर में मंत्रालय के अधिकारी चंदन कुमार को भी आरोपी बनाया गया है। वह भदौरिया को एनएमसी निरीक्षण से जुड़ी गोपनीय जानकारी देता था, जैसे- कब टीम आएगी, कौन सदस्य होंगे, निरीक्षण की तारीख आदि।
दलालों का बहुत बड़ा नेटवर्क
जांच में यह भी पता चला कि एनएमसी से सांठ-गांठ के लिए एक बड़ा दलाल नेटवर्क सक्रिय है। इसमें भदौरिया और रावतपुरा सरकार उर्फ रविशंकर महाराज की साझेदारी थी। दोनों भिंड के लहार के रहने वाले हैं। इंडेक्स ग्रुप के तहत मेडिकल, डेंटल, फार्मेसी, पैरामेडिकल और मैनेजमेंट कॉलेज शामिल हैं, जो मालवांचल यूनिवर्सिटी से संबद्ध हैं। भदौरिया इस यूनिवर्सिटी और मयंक वेलफेयर सोसायटी का संचालन करते हैं। भदौरिया पर आरोप हैं कि वह कॉलेजों के चेयरमैन और डायरेक्टर से 3 से 5 करोड़ रुपए लेकर अनुकूल मान्यता दिलवाते थे, चाहे संस्थान एनएमसी के मानकों पर खरे न उतरते हों। भदौरिया ने कॉलेज में अस्थायी डॉक्टरों की नियुक्ति की और एनएमसी निरीक्षण के वक्त उन्हें स्थायी फैकल्टी बताया।
रिश्वत देकर कमियों पर डाला पर्दा
मेडिकल कॉलेज के लिए लेक्चर हॉल्स, प्रेक्टिकल लैब, लाइब्रेरी, कॉलेज के अस्पताल में बेड संख्या, फैकल्टी और स्टाफ आदि की संख्या के मानक तय है। एनएमसी की टीम सभी सुविधाओं का निरीक्षण करती हैं। एक बार मान्यता मिलने के बाद कॉलेज को हर साल एनएमसी को रिपोर्ट देनी होती है। अगर मानकों का पालन न हो, तो मान्यता रद्द की जा सकती है। कॉलेज ने इन्हीं कमियों को छुपाने के लिए रिश्वत दी। उधर, नवा रायपुर स्थित श्री रावतपुरा मेडिकल कॉलेज को 250 सीटों की मान्यता दिलाने के नाम पर 55 लाख की रिश्वत देने का मामला सामने आया है। सीबीआई ने 6 आरोपियों को रंगे हाथों गिरफ्तार भी कर लिया।