वॉइस ऑफ डीसी में डेली कॉलेज के ‘वर्तमान नेतृत्व’ पर उठे सवाल, पुराने नेतृत्वकर्ताओं के चार्ट के साथ लिखा- वे ‘साम्राज्य’ नहीं, ‘संस्थान’ बनाते थे.
इंदौर। मध्यप्रदेश के 150 साल से अधिक पुराने डेली कॉलेज की प्रतिष्ठा इन दिनों दांव पर लगी है। पूरे देश में कभी प्रतिष्ठित रही यह संस्था इन दिनों किसी उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि विवादों के लिए पहचानी जाने लगी है। ओल्ड डेलियन और पैरेंट्स लगातार सवाल उठा रहे हैं, लेकिन वर्तमान डीसी बोर्ड संविधान बदलकर अपनी मनमानी कायम रखना चाहता है। ताज्जुब तो तब होता है कि जब सरकारी विभाग भी आंखों पर पट्टी बांधकर बैठ गए हैं।
इस्टाग्राम पर वॉइस ऑफ डीसी के माध्यम से ओल्ड स्टूडेंट, पैरेंट्स और सदस्य लगातार सवाल उठा रहे हैं। इसी ग्रुप पर डीसी बोर्ड के सदस्य धीरज लुल्ला और मोनू भाटिया को लोग निशाना बना चुके हैं। इससे पहले एक पोस्ट में डेली कॉलेज को अपने अस्तित्व के लिए गुहार लगाते बताया गया था। हर दिन नया पोस्ट आ रहा है, जिसमें वर्तमान डीसी बोर्ड को लेकर सवाल किए जा रहे हैं। अब ताजे पोस्ट में डेली कॉलेज के पुराने नेतृत्वकर्ताओं का चार्ट देते हुए कई सवाल उठाए गए हैं। इन सबके बावजूद धीरज लुल्ला और मोनू भाटिया नियमों के विपरित 12 नवंबर को डीसी बोर्ड की बैठक बुलाकर संविधान बदलने की तैयारी में हैं।
ये वॉइस ऑफ डीसी का ताजा पोस्ट-
यह सिर्फ एक चार्ट नहीं है।
यह वह आइना है जो बताता है कि नेतृत्व कभी क्या हुआ करता था- दूरदर्शी लोग, राष्ट्र निर्माता, उद्योगपतियों के नाम…
वे लोग जिनके नाम ईमानदारी, बुद्धिमत्ता और प्रभाव का प्रतीक थे।
उन्हें ईमानदारी का विज्ञापन करने की ज़रूरत नहीं थी- यह उनके कामों में दिखता था।
वे साम्राज्य नहीं, संस्थान बनाते थे।
अनुयायी नहीं, विरासत छोड़ते थे।
और फिर आया वर्तमान।
नेतृत्व का एक नया रूप- विरासत से ज़्यादा शोर, और सत्य से भी ज़्यादा खोखला।
जहाँ उद्देश्य की जगह शक्ति ने ले ली,
और हक़दारी ने सेवा का मुखौटा पहन लिया।
वे हमें “न्यूज़ेंस” कहते हैं।
शायद वे सही हैं।
क्योंकि सवाल सच में असहजता पैदा करते हैं-खासकर उनके लिए जिनके पास कोई जवाब ही नहीं।
तो हाँ -हम “न्यूज़ेंस” हैं।
नारे लेकर नहीं,
बल्कि तथ्यों, यादों और टूटे दिलों से लैस।
क्योंकि जब एक सदी पुरानी संस्था को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तक सीमित कर दिया जाता है,
तो चुप रहना विश्वासघात बन जाता है।
और जो आज हमें नेतृत्व दे रहे हैं-
गूगल पर उनके नाम “court cases” के साथ खोजिए।
फिर खुद तय कीजिए — यह न्यूज़ेंस है…या ज़रूरत?
क्योंकि कई बार,
जो सवाल पूछते हैं, वे न्यूज़ेंस नहीं होते।
वे होते हैं जो बिना विवेक के संस्था को नष्ट कर देते हैं।
आखिर क्यों उठ रहे ऐसे सवाल?
डेली कॉलेज का भला चाहने वाले आखिर क्यों ऐसे सवाल उठा रहे हैं? आखिर क्यों कहा जा रहा है कि इनके कोर्ट केसेस गूगल पर सर्च कर लीजिए? इसका जवाब तो आपको मात्र धीरज लुल्ला के केसेस से ही मिल जाएगा। खुशी कूलवाल सुसाइड केस सर्च कर लीजिए, धीरज लुल्ला का नाम सुर्खियां बटोरता मिल जाएगा। बैंक डिफाल्टर में सर्च कर लीजिए, एचडीएफसी बैंक की डिफाल्टर लिस्ट में लुल्ला का नाम शान बढ़ाता दिख जाएगा। मोनू भाटिया से जुड़े विवादों की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इस तरह के लोग एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्था में क्या कर रहे हैं? कैसे इन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार मिलता है?