धर्मान्धता की चरस - 'चरक: फेयर ऑफ फेथ'.
-डॉ.प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
सुदीप्तो सेन अब अपने खास एजेंडे से अलग हो गए हैं। उनकी फिल्म द केरल स्टोरी करीब तीन साल पहले आई थी। खूब माल कूटा था। 300 करोड़ से भी ज्यादा कमाया था फिल्म ने। सुदीप्तो ने मुझसे कहा था कि इससे अब मैं इतना कमा चुका कि अब बीस फ़िल्में खुद बना सकता हूँ। अब उन्होंने 'चरक: फेयर ऑफ फेथ' बनाई। इसके डायरेक्टर शीलादित्य मौलिक हैं। सुदीप्तो सेन ने इसे प्रोड्यूस किया है। कोई बड़ा नामचीन कलाकार इसमें नहीं है। मुख्य कलाकार अंजलि पाटिल, साहिदुर रहमान, सुब्रत दत्ता, शशि भूषण, संखदीप बनर्जी और अनेक ग्रामीण कलाकार इसमें हैं। वीएफएक्स और सीजीआई आदि भी नहीं है। पूरी फिल्म को गाँव में शूट किया गया है।
चरक पूजा चैत्र मास की संक्रांति (चैत्र संक्रांति) पर मनाई जाती है, जो आमतौर पर 14 अप्रैल को पड़ती है। इस विषय पर बानी यह फिल्म सबकुछ समेत लेने के चक्कर में न तो फीचर फिल्म बन पाई, ना डॉक्यूमेंट्री ! निर्माता-निर्देशक खुद ही कनफ्यूज थे कि वो दिखाना क्या चाहते हैं। लोक पर्व चरक को दिखाना था, नर बलि दिखानी थी, मर्डर मिस्ट्री दिखानी थी या कुछ और !
गाँव में चरक पूजा और मेला भरने की तैयारियाँ चल रही हैं। यह त्योहार भक्तों से शारीरिक कष्ट और बलिदान की माँग करता है। फिल्म शुरू में आस्था को परिभाषित करती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, एक बच्चे की मौत और गाँव की बढ़ती हुई रहस्यमयी घटनाएं तनाव पैदा कर देती है। भक्ति कभी-कभी इंसानियत की परतों को धुंधला कर देती है। हताशा और अंधविश्वास लोगों को ऐसी हरकतें करने पर मजबूर कर देते हैं, जो लॉजिक, नैतिकता और मानवता के खिलाफ हैं।
निर्माता का दावा है कि यह फिल्म अन्धविश्वास के खिलाफ एक आवाज़ है। डॉक्यूमेंट्री टाइप फिल्म है। शतक की जगह इसे मनोरंजन कर मुक्त किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें मनोरंजन है ही नहीं।
शुद्ध अझेलनीय फिल्म !
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-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
निर्माता का दावा है कि यह फिल्म अन्धविश्वास के खिलाफ एक आवाज़ है। डॉक्यूमेंट्री टाइप फिल्म है। शतक की जगह इसे मनोरंजन कर मुक्त किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें मनोरंजन है ही नहीं।