जजों के तबादले पर सुप्रीम कोर्ट जज की दो टूक: केंद्र के दखल से कोलेजियम की निष्पक्षता खतरे में.
जजों के तबादले पर सुप्रीम कोर्ट जज की दो टूक: केंद्र के दखल से कोलेजियम की निष्पक्षता खतरे में
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने जजों के तबादलों में केंद्र सरकार की कथित भूमिका को लेकर कड़ी और बेबाक टिप्पणी की है। उन्होंने साफ कहा कि यदि किसी न्यायाधीश का तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया जाता है, तो यह कोलेजियम प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।
पुणे में संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक शासन विषय पर लेक्चर देते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि जजों की नियुक्ति और तबादला पूरी तरह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है, जिसमें कार्यपालिका की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब कोलेजियम खुद यह दर्ज करे कि किसी जज का तबादला सरकार के अनुरोध पर बदला गया, तो यह संवैधानिक रूप से स्वतंत्र मानी जाने वाली प्रक्रिया में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को उजागर करता है।
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी उस विवाद की पृष्ठभूमि में आई है, जिसमें जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले से जुड़ा कोलेजियम का फैसला चर्चा में रहा। पहले उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ट्रांसफर करने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में सरकार की पुनर्विचार मांग पर उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बदलाव से संबंधित जज की वरिष्ठता और न्यायिक प्रभाव दोनों पर असर पड़ा।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी जज को सिर्फ इसलिए स्थानांतरित किया जाना चाहिए क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ असुविधाजनक आदेश दिए? जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि तबादलों का उद्देश्य केवल न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए होना चाहिए, न कि किसी न्यायाधीश को दंडित करने के लिए। ऐसा कोई भी कदम संविधान के मूल ढांचे—न्यायपालिका की स्वतंत्रता—को कमजोर करता है।
उन्होंने याद दिलाया कि कोलेजियम प्रणाली का निर्माण ही इसलिए किया गया था ताकि जजों की नियुक्ति और तबादले राजनीतिक दबाव से मुक्त रह सकें। यदि कोलेजियम के सदस्य ही कार्यपालिका के प्रभाव में आ जाएं, तो यह व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक जाएगी।
उन्होंने दो टूक कहा कि संविधान सर्वोच्च है, न कि संसद या सरकार। संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है कानून का शासन, न कि व्यक्तियों या बहुमत का। न्यायाधीशों को राजनीतिक दबाव के सामने झुकने के बजाय दृढ़ता से खड़े रहना होगा—यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।