महापौर वर्सेस निगमायुक्त की लड़ाई में बर्बाद हो रहा शहर, देश के सबसे साफ शहर में शुरू हो गई गंदी राजनीति.
इंदौर। कल यानी शनिवार को देर रात तक भंवरकुआं थाने में जो कुछ भी हुआ वह शहर के हित में नहीं है। नगर निगम के अधिकारियों व कर्मचारियों को किसी आम नागरिक से बदतमीजी का अधिकार नहीं है और न ही किसी पार्षद को शासकीय कार्य में बाधा डालने का अधिकार है। लेकिन, थाने में दर्ज एफआईआर के हिसाब से कल दोनों हुआ और उससे महापौर पुष्यमित्र भार्गव और निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव के बीच तलवारें खींची नजर आ रही हैं।
इंदौर में पहले भी महापौर और निगमायुक्त के बीच तनातनी चलती रही है, लेकिन कल जो कुछ भी हुआ वैसा पहले शायद ही हुआ होगा। महापौर केवल राजनीतिक प्रतिनिधि ही नहीं होते, बल्कि शहर हित के सारे फैसले और कार्रवाईयां तक उनकी सहमति से ही तय किए जाते हैं। क्या निगमायुक्त बिना महापौर को ही बताए सारे निर्णय ले रहे हैं? एक तो ऐसा होना नहीं चाहिए, दूसरे अगर सर्वे का फैसला हो भी चुका है और उसको लेकर नागरिकों की शिकायतें आ रही हैं तो महापौर ने उसे रोकने के लिए निगमायुक्त को क्यों नहीं बोला?
महापौर की भूमिका पर उठ रहे सवाल
भाजपा नेताओं से लेकर रहवासियों तक के मन में यही सवाल है कि महापौर ने इस तरह के सर्वे कैसे शुरू होने दिया। अगर सर्वे हो भी रहा है तो रहवासियों को इतना परेशान क्यों किया जा रहा कि उन्हें थाने की शरण लेनी पड़ रही है? क्या महापौर इस मामले में बिल्कुल ही अनजान हैं या बैठकर तमाशा देख रहे हैं? क्या निगमायुक्त उनकी नहीं सुन रहे, अगर ऐसा है तो सीएम से उनकी शिकायत क्यों नहीं कर रहे?
निगमायुक्त के खिलाफ जमकर लगे नारे
कल भंवरकुआ थाने में जब महापौर परिषद सदस्य बबलू शर्मा करीब आधा दर्ज पार्षदों व महिलाओं के साथ एफआईआर दर्ज कराने पहुंचे तो निगमायुक्त के खिलाफ जमकर नारे लगे। इससे साफ जाहिर है निगमायुक्त पार्षदों की नहीं सुन रहे। जब पार्षदों की नहीं सुन रहे तो महापौर की भी नहीं ही सुन रहे होंगे। बबलू शर्मा का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें वे यह कहते सुने जा रहे हैं कि निगमायुक्त जब अड़ गए हैं तो वे भी अड़े हुए हैं और उनकी एफआईआर भी दर्ज होनी चाहिए। उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई है। बबलू शर्मा फोन पर बात करते हुए नजर आ रहे हैं कि वे थाने से बाहर नहीं जाएंगे कोई उन्हें गोली मार देगा तो।
पार्षदों का कहना है नपती में कर रहे दादागिरी
पार्षदों का कहना है कि नगर निगम सर्वे के नाम पर दादागिरी कर रहा है। छत की नपती करने आ रहे हैं तो खिड़की के छज्जों तक की नपती कर रहे हैं। विरोध करने पर बदतमीजी और मारपीट कर रहे हैं। निगमायुक्त से शिकायत करो तो वे सुन नहीं रहे। एमआईसी सदस्य बबलू शर्मा ने तो यह भी कहा कि जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है और वे क्या जनता के हितों की रक्षा भी नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि रोज लोगों के साथ बदतमीजी होती है हम तो समझौता कराते हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
पुलिस भी क्या करती, दोनों तरफ से दर्ज किया केस
इस मामले में पुलिस को इसलिए दोषी नहीं ठहरा सकते कि उसने दोनों तरफ से एफआईआर दर्ज कर ली। पहले पिपलियाराव निवासी बीरम पिता नानूराम सोलंकी की शिकायत पर नगर निगम के बीआरओ शैलेंद्र सिंह के खिलाफ केस दर्ज हुआ। इसके बाद शैलेन्द्र सिंह की शिकायत पर पार्षद पति सुनील हार्डिया और दो अन्य लोगों पर शासकीय कार्य में बाधा डालने की धाराओं में केस दर्ज किया है।
सीएम के प्रभार वाले जिले में ऐसा कैसे हो रहा?
कल के घटनाक्रम के बाद भाजपा के लोग ही यह सवाल उठा रहे हैं कि सीएम के प्रभार वाले जिले में आखिर ऐसा क्यों हो रहा? क्या इंदौर में सत्ता और संगठन के बीच तालमेल नहीं है? लोग तो यह भी कह रहे हैं कि सीएम को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए नहीं तो यह शहर बर्बाद हो जाएगा।
आखिर महापौर की अफसरों से क्यों नहीं बनती?
इस पूरे प्रकरण के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर महापौर की अफसरों से क्यों नहीं बनती? इससे पहले जब शिवम वर्मा निगमायुक्त थे, तब भी महापौर से उनकी नहीं बनी। इसकी शिकायत महापौर कई बार सीएम से कर चुके हैं। हालांकि हुआ इसके उल्टा, शिवम वर्मा को सजा देने की बजाए उन्हें इंदौर में ही कलेक्टर बना दिया गया। अब नए निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव के साथ भी यही हो रहा है तो सवाल उठना लाजिमी है कि अफसर ही गलत आ रहे हैं या महापौर की तरफ से कुछ गड़बड़ी हो रही है या फिर कोई और ही इस लड़ाई को हवा दे रहा है।