बेचारी इंदौर की भोली पुलिस ने ‘सूरज’ को ही दिखा दी ‘आंख’ .
अपने इंदौर की पुलिस या तो बहुत भोली है या फिर भोली होने का नाटक करती है। भाई एक शराब कारोबारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत आपकी कैसे हुई? शराब पर ही तो पूरे प्रदेश की अर्थव्यवस्था चलती है। जायज से लेकर नाजायज कमाई तो इसी धंधे में हैं। अभी देखा ही होगा धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया को। बेचारे ‘मेहनत’ करते-करते रिटायर हो गए। जो भी ‘खून-पसीने’ की कमाई थी, उसे भी लोकायुक्त वालों ने नहीं छोड़ा।
अब अपने इंदौर के शराब कारोबारी सूरज रजक भिया को ही देख लीजिए। बेचारे करोड़पतियों में उभरते हुए सितारे हैं। अब शराब का धंधा है तो पैसा आएगा ही और जब पैसा आएगा तो सारे गलत काम करने का लाइसेंस अपने आप मिल जाता है।
सूरज भिया ने दो किसान युवकों पर गोली क्या चला दी, पुलिस वालों ने उन पर एफआईआर दर्ज कर ली। सूरज भिया को इसका अधिकार है। पिस्टल का लाइसेंस भी शासन-प्रशासन ने ही दिया है। ऐसे में उन किसान युवकों को कुछ बोलना ही नहीं था। जब सूरज भिया को वे पहचान गए तो उनकी हिम्मत कैसे हुई कि पुलिस में चले गए। अरे थोड़ी पिटाई ही तो हुई थी। हवाई फायर कर डराया ही तो था।
पुलिस ने एक विधायक के कहने पर जोश-जोश में एफआईआर दर्ज कर ली। सूरज भिया ने इसे दिल पर ले लिया और जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि उन पर हमला हुआ है। अपने सारे पट्ठों को सोशल मीडिया पर लगा दिया कि शराब सिंडिकेट ने उन पर हमला किया है। और तो और सूरज भिया को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने थाने का घेराव करने की चुनौती देकर पुलिस वालों को सबक ठिकाने की ठान ली।
फिर क्या था पुलिस वालों के पसीने छूट गए। कई थानों का बल कनाड़िया थाने को बचाने पहुंच गया, लेकिन सूरज भिया नहीं पहुंचे। खैर, इसके बाद मामला जांच-पड़ताल के नाम पर ठंडे बस्ते में है।
सवाल यह है कि जब आपको सूरज को आंख दिखाने की हिम्मत नहीं थी तो आपने उसकी ओर देखने की कोशिश क्यों की? और जब थाने पहुंचे किसान युवकों की शिकायत को सही मानकर एफआईआर दर्ज कर ही ली है तो कार्रवाई की हिम्मत भी दिखा देते।
लोग कह रहे हैं-क्या पुलिस सूरज से डर गई या किसी दबाव में है या फिर दीपावली के मौसम में मन डोल गया…