अब मध्यप्रदेश भाजपा में सिर्फ ‘मोहन’ की ‘मुरली’.
अगर आप राजनीति में थोड़ी भी दिलचस्पी रखते हैं तो आपको याद होगा कि डॉ.मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाने के बाद भाजपा में कई नेताओं के पेट में मरोड़ उठने लगे थे। यही नेता यह कहते फिर रहे थे कि सिर्फ लोकसभा चुनाव तक मोहन यादव मुख्यमंत्री बने रहेंगे। जब इसके बाद भी प्रदेश में कुछ नहीं बदला तो पेट का मरोड़ और बढ़ा। कई नेता उल्टियां भी करने लगे।
अब भले ही मोहन यादव चीरफाड़ वाले डॉक्टर नहीं हैं, लेकिन नाम के साथ तो डॉक्टर लगा ही है। इसके बाद यही डॉ.मोहन यादव पेट में मरोड़ वालों का इलाज भी करने लगे। फिर हो-हल्ला मचा। इलाज से बौखलाए कई नेता तो कैबिनेट की बैठकों में भी अपनी बीमारी का इजहार करने लगे, लेकिन डॉ.मोहन मौन रहे।
इस सफर में थोड़ा और आगे चलते हैं। कुछ नेता जो केंद्र से मध्यप्रदेश की राजनीति में आए थे और कुछ ऐसे भी जिन्हें यह गुमान था कि वे आलाकमान के करीबी हैं, उनके मुगालते भी धीरे-धीरे दूर होने लगे। ऐसा तब हुआ जब लोकसभा चुनाव में ही नहीं, अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी डॉ.मोहन यादव की पूछ-परख बढ़ने लगी। खास बात यह कि जिस भी विधानसभा में प्रचार करने गए, चाहे वह कोई भी प्रदेश हो वहां भाजपा का परचम लहराया। इसके बाद पेट में मरोड़ वाले नेताओं की बीमारी धीरे-धीरे ठीक होने लगी। भले ही उनके पेट में मरोड़ आज भी उठते होंगे, लेकिन अब वे इजहार करने से बचने लगे।
धीरे-धीरे प्रशासनिक तंत्र पर शिकंजा कसा, फिर आई बात संगठन की। फिर पेट में मरोड़ वाले नेता सक्रिय हुए, लेकिन डॉ.मोहन यादव और संघ के वरिष्ठ नेता सुरेश सोनी ने बैतूल के विधायक हेमंत खंडेलवाल पर मुहर लगा दी थी। करीब छह महीने पहले से ही इसकी चर्चा थी। अक्सर भाजपा में होता यही है कि जिसका नाम चले, उसकी नियुक्ति नहीं होती, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि, आलाकमान यह तय कर चुका था कि मध्यप्रदेश में जो कुछ भी होगा वह मोहन ही तय करेंगे।
अब पिक्चर साफ है। मध्यप्रदेश में मोहन की मुरली ही बजेगी। भले ही आप कितना भी विरोध कर लें, आपने कोई महत्वाकांक्षा पाल रखी हो, नाचना तो आपको मोहन की मुरली की धुन पर ही पड़ेगा। नए प्रदेश अध्यक्ष ने भी क्लियर कर दिया है कि जो भी दाएं-बाएं चलेगा, उसको परेशानी होगी।