आखिर डेली कॉलेज में चुनाव नहीं लड़ने की बात क्यों कर रहे धीरज लुल्ला, पैरेंट्स का सवाल-इतना विवादित व्यक्ति डीसी बोर्ड में है कैसे?.
इंदौर। डेली कॉलेज में चल रहे विवाद के बीच आरोपों से घिरे डीसी बोर्ड के सदस्य धीरज लुल्ला अब यह कहते फिर रहे हैं कि उन्हें चुनाव नहीं लड़ना। इधर, पैरेंट्स का सवाल है कि खुशी कूलवाल सुसाइड केस में नाम उछलने से लेकर बैंक डिफाल्ट होने के बाद भी धीरज लुल्ला आखिर मध्यप्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के बोर्ड में हैं कैसे? और अगर अब चुनाव नहीं लड़ना है तो संविधान संशोधन के लिए पूरी ताकत क्यों लगा रहे?
उल्लेखनीय है कि इस संस्थान का संचालन करने वाले डीसी बोर्ड पर पैरेंट्स से लेकर ओल्ड डेलियन तक लगातार सवाल उठा रहे हैं। वैसे तो बोर्ड में 9 मेंबर हैं, लेकिन इसके एक सदस्य धीरज लुल्ला ने 64 पेज का बुकलेट जारी कर दावा किया है कि सारे काम वही कर रहे हैं। लुल्ला ने अपने दावों में पैरेंट्स और ओल्ड डेलियन तथा अन्य सदस्यों द्वारा उठाए गए सवालों पर लीपापोती करने की कोशिश की है। इसी बुकलेट में उन्होंने आगे चुनाव नहीं लड़ने की बात कही थी। इस पर वॉइस ऑफ डीसी में सवाल भी उठे थे।
अगर इतनी ही ईमानदारी तो क्यों बढ़ाया कार्यकाल
पैरेंट्स और ओल्ड डेलियन यह सवाल उठा रहे हैं कि अगर लुल्ला इतने ही ईमानदार हैं और डेली कॉलेज का भला चाहते हैं तो उन्हें 10 वर्ष में दो बार कार्यकाल बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी। लुल्ला के रहते हुए ही डेली कॉलेज के इतिहास में 2020 और 2025 में दो बार कार्यकाल बढ़ा। इसका मतलब साफ है कि लुल्ला डीसी बोर्ड पर कब्जा रखना चाहते हैं।
संविधान संशोधन के लिए पदों की बंदरबांट
सूत्र बताते हैं कि लुल्ला डीसी बोर्ड का चुनाव नहीं लड़ने की बात इसलिए कर रहे, क्योंकि वह संविधान संशोधन कर वह कैटेगरी ही खत्म करना चाहते हैं, जिसमें वे सदस्य हैं। वह कैटेगरी है ओल्ड डेलियन एसोसिएशन। इस कैटेगरी से वर्तमान में संदीप पारेख और धीरज लुल्ला सदस्य हैं। इतना ही नहीं इस संविधान संशोधन के लिए नए दानदाता श्रेणी के सदस्य हरपाल भाटिया उर्फ मोनू भाटिया को उपाध्यक्ष पद देने की बात भी तय हो गई। सूत्र बताते हैं कि धीरल लुल्ला ने कई अन्य सदस्यों से भी पदों को लेकर बात की है।
बिना चुनाव लड़े ही एंट्री की तैयारी में लुल्ला
सूत्र बताते हैं कि संविधान संशोधन कर धीरज लुल्ला जहां दूसरे सदस्यों का रास्ता रोकना चाहता हैं, वहीं खुद सरकार की तरफ एंट्री की पूरी तैयारी में हैं। इसके लिए संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का सहारा लिया जा रहा है। एक अन्य संघ के पदाधिकारी को 30 करोड़ के काम का ठेका दिया गया है। संघ के उक्त पदाधिकारी यह जानते हुए भी कि धीरज लुल्ला विवादित हैं, सरकारी विभागों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लुल्ला पूरी तरह आश्वस्त हैं कि वे सरकार के माध्यम से बोर्ड में आ जाएंगे, इसीलिए चुनाव नहीं लड़ने की बात कर रहे हैं।
लुल्ला को है पोल खुल जाने का है डर
दरअसल धीरज लुल्ला को यह डर है कि अगर चुनाव हुए और नया बोर्ड आ गया तो उनके काले कारनामों से पर्दा उठ सकता है। सूत्र बताते हैं कि बोर्ड में काफी आर्थिक अनियमितताएं हुई हैं। इसी कारण एजीएम भी नहीं बुलाई जाती और बोर्ड के 9 सदस्य ही सारे फैसले लेते हैं। सूत्र बताते हैं कि लुल्ला ने 60 लाख रुपए देकर डेलॉइट कंपनी से ऑडिट कराया गया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक उजागर नहीं की गई। इसमें भी भारी पैमाने पर गड़बड़ी की आशंका जाहिर की जा रही है। फर्म एंड सोसायटी ने 1976 में एक संशोधन किया था, जिसमें पारदर्शिता के लिए एजीएम बुलाना अनिवार्य किया गया था। एजीएम में सारा लेखा जोखा रखने तथा सारे फैसले लेने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन लुल्ला ऐसा नहीं करते। अगर एजीएम बुला ली गई और सारा हिसाब-किताब सामने आ गया तो लुल्ला की पोल खुल जाएगी।
अब सोशल मीडिया पर कर रहे लीपापोती की कोशिश
जब सारा मामला उजागर हो गया और पैरेंट्स कलेक्टर शिवम वर्मा के पास शिकायत लेकर पहुंच गए तो धीरज लुल्ला अब सोशल मीडिया पर इस मामले की लीपापोती की कोशिश में लग गए हैं। 12 नवंबर को होने वाली बैठक को लेकर भी माहौल बनाया जा रहा है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से भी खुद को पाक-साफ बताने की कोशिश की जा रही है, लेकिन अब सारा मामले सामने आ चुका है। कलेक्टर शिवम वर्मा ने भी स्पष्ट निर्देश दे दिए हैं कि 12 नवंबर को होनेवाली बैठक में संविधान संशोधन जैसे कोई फैसला नहीं लिए जाएं।