डेली कॉलेज के मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद वॉइस ऑफ डीसी में फिर उठी आवाज, 'गलत को ना', चाहे वकील कितना भी बड़ा या महंगा हो.
इंदौर। किसी भी तरीके से डेली कॉलेज का संविधान बदलने की कोशिश में जुटे डीसी बोर्ड के मंसूबों पर हाईकोर्ट के आदेश ने भी पानी फेर दिया है। ऐसा ही आदेश पहले कलेक्टर शिवम वर्मा ने भी दिया था और सहायक रजिस्ट्रार फर्म एंड सोसाटी ने भी, लेकिन डीसी बोर्ड इन सबको नजरअंदाज कर अपनी कोशिशों में लगा रहा। डेली कॉलेज के पक्ष में सोशल मीडिया पर आवाज उठाने वाले लोगों ने वॉइस ऑफ डीसी पर हाईकोर्ट के आदेश पर फिर से एक पोस्ट किया है।
उल्लेखनीय है कि डीसी बोर्ड के संविधान बदलने की कोशिशों की शिकायत कलेक्टर शिवम वर्मा तक भी पहुंची थी। कुछ पैरेंट्स ने कहा था कि डीसी बोर्ड 12 नवंबर को बैठक कर संविधान में संशोधन करने जा रहा है। पैरेंट्स ने इस मामले में अब तक चली कवायद और कुछ लंबित प्रकरणों का भी हवाला दिया था। इसके बाद कलेक्टर ने सहायक रजिस्ट्रार फर्म एंड सोसायटी बीडी कुबेर को इस संबंध में आदेश दिए थे। इसमें पुराने लंबित प्रकरणों का हवाला देकर कहा गया था कि 12 नवंबर की बैठक में संविधान संशोधन संबंधी कोई फैसला नहीं लिया जाए। इसके बाद बैठक तो हुई, लेकिन संविधान संशोधन नहीं हो पाया। बैठक वाले दिन डीसी बोर्ड यह पूरी कोशिश करता रहा कि कलेक्टर के आदेश पर भी स्टे लाया जाए, लेकिन यह कोशिश भी सफल नहीं हुई थी।
वॉइस ऑफ डीसी में फिर उठी आवाज
D के पूर्व छात्र और अभिभावक पीढ़ियों से इस स्कूल से प्रेम करते आए हैं।
हम सत्ता या राजनीति के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्षता, ईमानदारी और सत्य के लिए खड़े हैं।
हम बोलते हैं क्योंकि हमें परवाह है।
जब रजिस्ट्रार ने AGM बुलाया, तो यह उस जगह में फिर से पारदर्शिता लाने का अवसर था, जिसने हमें बनाया।
लेकिन इसे अपनाने के बजाय, बोर्ड ने स्टे, कानूनी दबाव, और यहां तक कि संविधान को बदलकर स्थायी नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की।
कलेक्टर और सहायक रजिस्ट्रार ने इस खतरे को समझा और उन बदलावों को रोककर स्कूल की रक्षा की।
और आज, हाई कोर्ट ने भी साफ़ “ना” कह दिया।
संवैधानिक हेरफेर को ना।
असहमति के डर में लिए गए फैसलों को ना।
गलत को ना- चाहे वकील कितना भी बड़ा या महंगा क्यों न हो।
क्योंकि अंत में-
सच को ताकत नहीं, साहस चाहिए।
और पूर्व छात्र व अभिभावक हमेशा साहस को चुप्पी पर चुनेंगे।