फिल्म समीक्षा : अटपटी, चटपटी और खटपटी है- ओ रोमियो .
-डॉ.प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
वैलेंटाइन डे के ठीक पहले लगी फिल्म ओ रोमियो एडल्ट फिल्म है। वैलेंटाइन डे बच्चों के लिए थोड़े ही होता है भिया! और ये कोई रोमियो जूलियट जैसी लव स्टोरी थोड़े ही है। ये है शाहिद कपूर यानी उस्तरा और उसकी गर्लफ्रेंड तृप्ति डिमरी उर्फ़ सुपारी जान की हिंसक, प्रेम और गैंगवार की कहानी। फिल्म में हर लेवल की हिंसा, खून खराबा और गाली गलौज शामिल है। फिल्म में मां-बहन की गालियां तो सभी पात्र देते हैं, दादी का रोल करने वाली फरीदा जलाल भी एक मौके पर गाली दे ही देती है। यही आजकल की फिल्मों का न्यू नॉर्मल है!
कुल मिलाकर यह फिल्म अटपटी, चटपटी और खटपटी है। फ़िल्मी परदे पर एक फिल्म चल रही है और गाना चालू है - धक् धक् करने लगा, मोरा जियरा जलने लगा और इधर हीरो हॉल में लोगों को उस्तरा मार रहा है, गोली मार रहा है, धायं, धड़ाम, ढुशुम! गाना बज रहा है - काटे नहीं कटते ये दिन ये रात और मारकाट का प्रोग्राम चल रहा होता है। मुंबई की सड़कों पर गणेश विसर्जन का जुलूस निकल रहा है और उधर मार पिटाई तथा क़त्ल हो रहा है यानी यहाँ भी बैकग्राउंड का शोर कुछ और है और एक्शन कुछ और।
हीरो का नाम इस फिल्म में उस्तरा है। वह नाई की दुकाने में काम करता था, वहीं उस्तरे से एक गैंगस्टर को निपटा दिया। तब से यही नाम पड़ गया। अब वह दो-दो उस्तरे रखने लगा और दोनों हाथ से 'काम' करने लगा। गला काटना हो, अक्खा बदन उधेड़ना हो या किसी टकले गुंडे की खोपड़ी पर डिजाइनबाजी - सब में उस्ताद! पर हीरो है तो उसे पिस्तौल, मशीनगन, तलवार आदि चलाना तो आता ही है और वह मौके पर कोई कसर नहीं छोड़ता। वैसे हमारे इंदौर शहर में भी आम तौर पर सुपारीबाज के नाम ऐसे ही पड़ जाते हैं - टकला, कूबड़ा, भेंगा, टिंगू आदि।
हीरोइन मुजफ्फरनगर की है और ग्वालियर घराने का संगीत सीख रही है। अपने प्रेमी और पति की हत्या करने के इरादे से मुंबई घराने के सुपारी किलर मिस्टर उस्तरा के पास जाती है कि चार लोगों की सुपारी देना है। पूछती है - प्रति सुपारी क्या रेट है? हीरो भी हीरो है, ऐसे ही हर किसी का असाइनमेंट थोड़े ही लेता है। हीरोइन आत्म निर्भरता की और कदम बढ़ाती है, तब हीरो पिघलता है। जैसे एनिमल फिल्म का डायरेक्टर तृप्ति डिमरी और रणवीर कपूर के सीन में पिघला था, वैसी ही सिचुएशन होती है, पर शायद विशाल भारद्धाज की बीवी रेखा भारद्वाज ने माहौल बनने नहीं दिया होगा।
फिल्म की कहानी कोई चाहकर भी नहीं बता सकता, क्योंकि वह गालीबाजी, खूनखराबा और बेतुकी बातों से भरी पड़ी है। हीरो पचास- पचास को मार डालता है, लेकिन सुरक्षित बच जाता है। कोई जेल नहीं, कोई एफआईआर नहीं। नेपाल और स्पेन में भी मारकाट करता है, पर वहां के कानून से भी ऊपर है वह ! साठ- पैसठ किलो का ठिगना और चॉकलेटी हीरो सौ-सवा सौ किलो के बदमाश को उठाकर फेंक देता है! यह है डायरेक्टर च्यवनप्राश की शक्ति!
1995 से शुरू हुई यह कहानी मुंबई अंडरवर्ल्ड की पृष्ठभूमि में एक गैंगस्टर रोमांस-रिवेंज ड्रामा है. फिल्म में एक गैंगस्टर कहता है कि अयोध्या में बाबरी गिराने के बाद भारत के अंडरवर्ल्ड की दुनिया भी बंट गई है - हिन्दू गैंगस्टर और मुस्लिम गैंगस्टर। मुस्लिम गैंग वालों को आईएसआई खुलकर सपोर्ट कराती है।
विशाल भारद्वाज के संगीत और निर्देशन अलग ही छाप होती है। फिल्म के गाने ज़बरदस्त हैं। अरिजीत सिंह का गाना मधुर और कर्णप्रिय है। 92वें साल में चल रहे गुलज़ार के बोलों से किसी को भी रश्क हो सकता है। लिखते हैं - मुझे इश्क हुआ है या होनेवाला है! गाने के बोल तो देखिये -
हल्का हल्का फीवर है
सांस भी दुबली लगती है
धूप में जी नहीं लगता
छाँव भी ग़मगीन लगती है
क्या रोग ये पाला है
मुझे इश्क हुआ है या होने वाला है !
फिल्म के एक और गाने को मधुबंती बागची ने गाया है जिसके बोल हैं :
इतर महंगा था मगर ले लियाशाम ए गम के लिए थोड़ा जहर ले लिया
जीने मरने के सामान सारे मिले
आशिकों की कलोनी में घर ले लिया !
एक और गाना है - नीचे पान की दुकान, ऊपर जूली का मकान !
फिल्म की लंबाई लगभग 3 घंटे (178 मिनट) है और इसमें खून-खराबे और हिंसक सीन भरपूर हैं। शाहिद कपूर का किरदार बदला, प्यार और गैंगवार के बीच फंसा हुआ है। रोमांस और एक्शन का मिश्रण है, लेकिन कई जगह स्क्रीनप्ले एक फ्लो में नहीं चलता।
संवाद रोचक हैं जैसे - ''आशिकी का ज़ख़्म तनहाई से नहीं भरता। ''-''दिल दो पसलियों में कैद हैं।''-''ओए रोमियो! तू तो बस नाम का रोमियो है, असली में तो तू ... टाइप का है!"- "दिल टूटा तो ठीक है, लेकिन मेरा 'इगो' टूटा तो सारा शहर जल जाएगा!" - "प्यार में गिरना आसान है, लेकिन मेरे जैसे रोमियो से टकराना... जिंदगी भर कटेगा!"
फर्स्ट हाफ में गति अच्छी है, लेकिन सेकंड हाफ में कहानी खिंचती है, कुछ लॉजिक गैप्स आते हैं (जैसे कुछ किरदारों का 'मिरेकल' सर्वाइवल), और इमोशनल पे-ऑफ कमजोर पड़ जाता है।
शाहिद कपूर ने उस्तरा के किरदार में इंटेंसिटी, वल्नरेबिलिटी और गुस्से का शानदार मिश्रण दिया है। तृप्ति डिमरी ने हिंसा और मासूमियत का बैलेंस बहुत अच्छा किया है। सपोर्टिंग कास्ट में नाना पाटेकर और अविनाश तिवारी के इंटेंस परफॉर्मेंस हैं। विक्रांत मैसी, तमन्ना भाटिया और दिशा पाटनी के रोल छोटे लेकिन प्रभावी हैं।
विशाल भारद्वाज की सिग्नेचर स्टाइल साफ दिखती है, खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी, पावरफुल बैकग्राउंड स्कोर और कुछ शानदार गाने हैं। फिल्म में हिंसा को स्टाइलिश तरीके से महिमामंडित और लम्बा दिखाया गया है। स्क्रीनप्ले में असंगतियां और कुछ ओवर-ड्रामैटिक मोमेंट्स फिल्म की कमजोर कड़ियां हैं।
यह फिल्म शाहिद कपूर के फैंस, विशाल भारद्वाज के स्टाइल और इंटेंस गैंगस्टर-रोमांस पसंद करने वालों के लिए देखनीय है। लेकिन अगर आपको हल्की-फुल्की रोमांटिक फिल्म की उम्मीद में हैं, तो यह आपके लिए नहीं है- यह खूनी, भारी और इमोशनली हैवी फिल्म है।
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-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
यह फिल्म शाहिद कपूर के फैंस, विशाल भारद्वाज के स्टाइल और इंटेंस गैंगस्टर-रोमांस पसंद करने वालों के लिए देखनीय है। लेकिन अगर आपको हल्की-फुल्की रोमांटिक फिल्म की उम्मीद में हैं, तो यह आपके लिए नहीं है